राहुल सांकृत्यायन द्वारा यात्रा के पन्ने हिंदी में पीडीएफ फाइनल डाउनलोड | Yatra Ke panne By Rahul Sankrityayan In Hindi PDF Final Download

राहुल सांकृत्यायन द्वारा यात्रा के पन्ने हिंदी में पीडीएफ फाइनल डाउनलोड | Yatra Ke panne By Rahul Sankrityayan In Hindi PDF Final Download

सभी हिंदी पुस्तकें पीडीएफ Free Hindi Books pdf

पुस्तक डाउनलोड करे

पुस्तक ख़रीदे

श्रेणियो अनुसार हिंदी पुस्तके यहाँ देखें

अगर इस पेज पर दी हुई सामग्री से सम्बंधित कोई भी सुझाव, शिकायत या डाउनलोड नही हो रहे हो तो नीचे दिए गए Contact Us बटन के माध्यम से सूचित करें। हम आपके सुझाव या शिकायत पर जल्द से जल्द अमल करेंगे

hindi pustak contactSummary of Book / बुक का सारांश 

नेपाल को
__ दिसम्बर के अन्तिम सप्ताह मे टाईफाइड से पीड़ित हो मुझे पटना अस्पताल मे रहना पडा। करीब एक हफ्ते तक बेहोश रह कर ४ जनवरी को होश मे आया और ८ जनवरी को पहिले पहल मात और केला का पथ्य दिया गया। इसमे सन्देह नही, बीमारी से ही नही बल्कि मृत्यु से मै बाहर निकला था। इस सारी बीमारी में मेरे पुराने मित्र श्री धूपनाथसिंह छाया की तरह मेरी चारपाई के पास बैठे रहते । शायद सगे-सम्बन्धी भी इतनी सेवा नहीं कर सकते थे, जितनी कि धूपनाथ ने की । जिस वक्त मैं बेहोश था, उसके बारे मे तो मैं क्या कह सकता, लेकिन होश के वक्त उन्हे बहुत आग्रह करके सोने के लिये भेजना पड़ता था। बीमारी से छूटने के बाद शक्ति-सञ्चय की जरूरत थी, तब भी वह मेरे साथ रहे। यही नही २७ दिसम्बर को मेरे पास श्राकर बीच मे ५ दिनो को छोड़ वह तिब्वत के रास्ते मे काठमाण्डो तक मेरे साथ श्राये । वह चाहते थे, मेरे साथ तिब्बत चलें, लेकिन मेरे सामने खर्च का भी सवाल था। मै तीन सौ रुपये से यह तीसरी यात्रा करना चाहता था। मैं नही चाहता था कि वह अपने पास से खर्च करके मेरे साथ चलें।

freehindipustak पर उपलब्ध इन हजारो बेहतरीन पुस्तकों से आपके कई मित्र और भाई-बहन भी लाभ ले सकते है – जरा उनको भी इस ख़जाने की ख़बर लगने दें | 

to Nepal
I had to stay in Patna hospital after suffering from typhoid in the last week of December. After remaining unconscious for about a week, he regained consciousness on 4 January, and on 8 January, he was given the diet of Maat and Banana for the first time. There is no doubt about it, I came out not only from illness but from death. In all this illness, my old friend Shri Dhupnath Singh used to sit near my cot like a shadow. Perhaps even relatives could not do as much service as Dhupnath did. What can I say about the time when I was unconscious, but at the time of consciousness, he had to be sent to sleep with a lot of insistence. After getting rid of the disease, there was a need to accumulate strength, even then he remained with me. Not only this, on 27th December, except for 5 days in the middle of Shrakar, he accompanied me to Kathmandu on the way to Tibet. He wanted to go to Tibet with me, but I also had the question of expenses. I wanted to do this third trip with three hundred rupees. I did not want him to spend his money and go with me.

Connect with us / सोशल मीडिया पर हमसे जुरिए 

telegram hindi pustakhindi pustak facebook